महाराष्ट्रराजनीति

पत्रकारों की औकात क्या है नेताओ के निगाहों में,तुम्हारी विशात सिर्फ है इनकी खबरों को पहुंचाने में

3000 करोड़ रुपए की योजना में पत्रकारों के लिए एक लाख की भी कोई योजना नही ऐसा क्यों?

 

भायंदर(महानगर संवाददाता) दोस्तों यह लेख सिर्फ और सिर्फ पत्रकारों के लिए है जिसे देश का चौथा खंभा कहा जाता है।लेकिन इसे दूसरे लोग भी पढ़ सकते है।और यह लेख देश की आर्थिक राजधानी मुंबई से सटे ठाणे जिले के मीरा भायंदर महानगरपालिका क्षेत्र से संबंधित है। आगामी दो  जुलाई को मीरा भायंदर में मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस यहां आ रहे है। कार्यक्रम में इस शहर के विकास के लिए लगभग 3000 करोड़ रुपए की परियोजनाओं का भूमि पूजन, शिलान्यास, उद्घाटन का कार्यक्रमों की घोषणा की जाएगी। इस संबंध में शहर के दो विधायक शिवसेना शिंदे गुट के प्रताप सरनाइक और भाजपा/निर्दलीय विधायक गीता जैन ने एक प्रेस कांफ्रेंस करके यह जानकारी दी।सुनकर बहुत अच्छा लगा कि मीरा भायंदर जबसे ग्राम पचायत बना तब से लेकर आज तक इतनी बड़ी विकास योजना की घोषणा नही हुई। वाकई यदि इन विकास योजनाओं को ईमानदारी से लागू किया गया तो अपना शहर बहुत अच्छा हो जायेगा।पिछले कुछ दिनों से सभी समाज के लोगो के लिए भवन का भूमि पूजन बड़ी तेजी से हो रहा है जिसमे मैथिली समाज,बंगाली समाज,मराठा समाज,जैन समाज,बौद्ध समाज,उत्तर भारतीय समाज,मुस्लिम समाज और तो और शमशान और कब्रिस्तान के लिए भी उन्हे आलीशान बनाने की योजना है।समाज के लगभग सभी समाज को इसमें समाहित करने का प्रयास किया गया है।सिर्फ और सिर्फ किसी को यदि नजर अंदाज किया गया है तो वह है देश का फोर्थ पिलर जिसे पत्रकार समाज या बिरादरी कहा जाता है।तीन हजार करोड़ रुपए में से पत्रकारों के लिए एक करोड़ तो छोड़ो एक लाख रुपए की कोई योजना नहीं बनाई गई है।जबकि किसी अच्छे शहर की सरंचना में शिक्षा,स्वास्थ्य,परिवहन रोजी रोजगार के साथ ही साथ उस शहर में एक पत्रकार भवन नितांत आवश्यक होता है, जैसे मुंबई में प्रेस क्लब और मुंबई मराठी पत्रकार संघ की स्थापना की गई है।परंतु मीरा भायंदर मनपा क्षेत्र में ऐसा कोई ना भवन है और ना ही भविष्य में किसी को इसको बनाने की सोच ही हैं।क्योंकि शायद यहा के नेताओं की निगाहों में पत्रकारों की अवकात सिर्फ अपनी बात (खबर) लोगो तक मीडिया के माध्यम से पहुंचाने से ज्यादा कुछ है ही नहीं । मीरा भायंदर के पूर्व महापौर जयोत्शना हसनाले और वर्तमान मनपा आयुक्त दिलीप ढोले ने यहां के पत्रकारों से कई मीटिंगों में शहर में बस पास और आरोग्य बीमा जैसी छोटी चीज को देने का लालीपाप दिया था,महापौर तो अब भूतपूर्व हो गई,लेकिन मनपा आयुक्त तो अभी कार्यरत है परंतु आज तक पूरा नहीं कर सके।किसी भी वस्तु की मांग जब सप्लाई से ज्यादा होती है तो उस वस्तु की मूल्य बढ़ जाती है इसके विपरित जब मांग से ज्यादा सप्लाई होता है तो उस वस्तु की कीमत कम हो जाती है।कमोबेश यही स्थिति यहां के पत्रकारों की है।यहां के नेता इस बात को अच्छी तरह जानते है कि मेरे एक फोन पर एक समय बताने पर निशित किए गए स्थान पर पहले से ही पत्रकार पहुंच कर ऐसा इंतजार करते होंगे, जैसे लगता है कि नेता आते ही कुछ ऐसा करने वाले है जिससे कि उनका भाग्य ही बदल देंगे।फिर नेता के किए गए कान्फ्रेस के बाद सभी पत्रकार ऐसी जल्दी मचाते है कि सबसे पहले मेरा न्यूज बन जाए ताकि अमुक नेता सबसे पहले मेरा न्यूज देखकर खुश हो जाए। यहां के नेता यदि बहुत खुश हुए तो आपको कभी कभी दावत भी दे देते है जिसमे पत्रकार बड़ी तेजी से शामिल होते है।ऐसा लगता है कि जैसे वो इस तरह के दावत कभी खाए ही नही हो।नेता यदि ज्यादा खुश हो जाता है तो कभी होली, दिवाली या चुनाव के समय एकाध लिफाफे का इंतजाम कर देता है उसमे भी पत्रकारों की भगदड़ मच जाती है।सोचो इस शहर में तुम्हारे लिए कही बैठकर स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता करने का कही जगह है?नेताओ के लिए तो गली- गली में शाखा कार्यालय है, लेकिन पत्रकारों के लिए एक भी भवन नही है इस शहर में ऐसा क्यों जरा सोचो?मीरा भायंदर में सिर्फ पत्रकारों के लिए मनपा मुख्यालय में एक छोटा सा हाल दिया गया है जिसमे कायदे से कोई कांफ्रेंस भी नही हो पाती है।और वह भी जगह मनपा मुख्यालय की है, जहा उनके नियम और कानून लागू है।दैनिक पत्रकारों के लिए रात आठ बजे शहर के ब्रेकिंग न्यूज भेजने का समय होता है लेकिन यहां का पत्रकार कक्ष शाम छह बजे ही बंद कर दिया जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि आप जिन नेताओं के साल के तीन सौ पैंसठ दिन उनकी बातो( अच्छी बुरी खबरें)को पहुंचाने के लिए भागते रहते हो उनके निगाह में तुम्हारी अवजात क्या है?क्या आप इस शहर का नागरिक नही हो?क्या आप टैक्स नहीं भरते हो ?क्या आप इस शहर के समाज का हिस्सा नहीं हो ?शायद नहीं।यदि आप भी समाज का हिस्सा होते तो सभी समाज के भवनों के साथ ही आपके भी पत्रकार भवन अभी तक बन चुका होता या आने वाले दिनों में आपके पत्रकार भवन का भी भूमि पूजन या सिलन्यास हो चुका होता।एक कहावत बहुत पुरानी है कि पांच बुद्धिजीवी एक साथ एक राय कभी रख ही नही सकते है।शायद इस शहर के पत्रकार उसी पुरानी कहावत को आज भी चरितार्थ कर रहे है।हम आपस में भाषा के नाम पर,मजहब के नाम पर,छोटे बड़े पत्रकारों के नाम पर आपस में बटे हुए है। हमे अपनी अवकात खुद से बनानी होगी।हमे देश के अधिवक्ताओं से सीख लेनी चाहिए कि कोई घटना उत्तर प्रदेश के वकीलों के साथ घटती है तो उसकी गूंज दक्षिण भारत तक गूजती है बिना भेदभाव के।आप इस देश के चौथा स्तंभ हो,आप समाज का आइना( दर्पण)हो।आप समाज को दिशा देने वाले हो,आप जान जोखिम में डालकर भाष्ट्रचार को उजागर करने वाले हो, परंतु आपकी हैसियत नेताओं के निगाहों में क्या है? इसका मंथन करने और इस पर सोचने की आज जरूरत है। यह लेख किसी की भावना को आहत करने के उद्देश्य से नही लिखा गया है, अपितु पत्रकारों के साथ हो रहे भेदभाव से आहत होने पर यह कड़वी कहानी को बया करने की मात्र कोशिश की गई है।*

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